भारत में डराने वाली रिपोर्ट! हर 42वां बच्चा पहले जन्मदिन से पहले तोड़ रहा दम, गांवों में सबसे ज्यादा मौतों ने बढ़ाई चिंता

नई दिल्ली। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के दावों के बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। देश में शिशु मृत्यु दर में कमी जरूर आई है, लेकिन हालात अब भी पूरी तरह काबू में नहीं हैं। सबसे ज्यादा डराने वाली बात यह है कि आज भी भारत में हर 42 में से एक बच्चा अपना पहला जन्मदिन देखने से पहले ही दम तोड़ रहा है।

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2019 में देश की शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्म पर 30 थी, जो अब घटकर 24 हो गई है। यानी पहले की तुलना में हालात बेहतर हुए हैं, लेकिन आंकड़े अब भी खतरे की घंटी बजा रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत में स्थिति सबसे ज्यादा गंभीर बनी हुई है। गांवों में हर 37 में से एक बच्चे की मौत जन्म के पहले साल के भीतर हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, समय पर इलाज न मिलना और जागरूकता का अभाव इसके पीछे बड़ी वजह हैं।

राज्यों की बात करें तो Chhattisgarh शिशु मृत्यु दर के मामले में सबसे ऊपर रहा, जहां IMR 36 दर्ज की गई। इसके बाद Uttar Pradesh और Madhya Pradesh में यह आंकड़ा 35 रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ अस्पताल में डिलीवरी कराने से समस्या खत्म नहीं होगी, बल्कि नवजातों की सही देखभाल, पोषण और समय पर उपचार भी बेहद जरूरी है।

वहीं Kerala ने इस मामले में सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है। यहां शिशु मृत्यु दर केवल 8 दर्ज की गई, जो देश में सबसे कम है। इसके अलावा Himachal Pradesh, Tamil Nadu और Delhi में IMR 11 रही। बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, महिलाओं की शिक्षा और जागरूकता को इसका बड़ा कारण माना जा रहा है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि जन्म के बाद पहले 28 दिन बच्चों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हो रहे हैं। देश में कुल शिशु मौतों में करीब 73 प्रतिशत मौतें इसी अवधि में हुईं। भारत की नवजात मृत्यु दर 18 प्रति 1000 जीवित जन्म दर्ज की गई। इस मामले में भी केरल सबसे बेहतर रहा, जबकि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हालात काफी चिंताजनक पाए गए।

इतना ही नहीं, कई राज्यों में लड़कियों की शिशु मृत्यु दर लड़कों से ज्यादा दर्ज की गई है। Bihar में लड़कों की IMR 21 रही, जबकि लड़कियों की 25 दर्ज की गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जाए, मातृ स्वास्थ्य, पोषण और टीकाकरण पर ज्यादा ध्यान दिया जाए, तो आने वाले वर्षों में इन डराने वाले आंकड़ों को कम किया जा सकता है।

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