राष्ट्र के नाम संबोधन या चुनावी वार? पीएम के भाषण पर उठा सियासी तूफान, इरादों पर बड़े सवाल

महिला आरक्षण बिल पर घमासान, विपक्ष बोला—सरकारी मंच का हुआ राजनीतिक इस्तेमाल

नई दिल्ली।
प्रधानमंत्री Narendra Modi के राष्ट्र के नाम संबोधन को लेकर देश की राजनीति अचानक गरमा गई है। जहां एक ओर पीएम ने अपने भाषण में महिला आरक्षण विधेयक पास न होने के लिए कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके और समाजवादी पार्टी समेत विपक्षी दलों को जिम्मेदार ठहराया, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इस संबोधन को ‘राजनीतिक मंच’ के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है।

करीब 30 मिनट के इस संबोधन में पीएम मोदी ने बार-बार विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी ‘स्वार्थी राजनीति’ के कारण देश की नारी शक्ति को नुकसान उठाना पड़ा है। उन्होंने यह भी कहा कि जब यह प्रस्ताव गिरा तो कुछ दलों ने खुशी मनाई, जिसे देश की महिलाएं कभी माफ नहीं करेंगी।

हालांकि, कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन जैसे गंभीर मंच का इस्तेमाल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के लिए किया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह भाषण तथ्यों से ज्यादा राजनीतिक हमला था और इससे लोकतांत्रिक परंपराओं को ठेस पहुंची है।

खड़गे ने यह भी दावा किया कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कांग्रेस का दर्जनों बार जिक्र किया, जबकि महिलाओं के मुद्दे पर अपेक्षाकृत कम बात की गई। उनके मुताबिक, इससे सरकार की प्राथमिकताएं साफ दिखाई देती हैं। कांग्रेस ने यह भी दोहराया कि वह हमेशा महिला आरक्षण के पक्ष में रही है और 2010 में इसे राज्यसभा से पास कराने में उसकी अहम भूमिका रही थी।

वहीं, राज्यसभा सांसद Kapil Sibal ने भी सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्पष्ट नहीं था कि प्रधानमंत्री देश के प्रमुख के तौर पर बोल रहे थे या एक राजनीतिक दल के नेता के रूप में। उन्होंने इसे चुनावी माहौल में एक ‘नया निम्न स्तर’ करार दिया।

दरअसल, हाल ही में पेश किए गए 131वें संविधान संशोधन विधेयक को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। इस बिल का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को लागू करने के साथ-साथ परिसीमन के आधार पर सीटों की संख्या बढ़ाना था। लेकिन लोकसभा में यह विधेयक पास नहीं हो सका, जिसके बाद सियासी बयानबाजी तेज हो गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री का यह संबोधन ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में विपक्ष का आरोप है कि इस मुद्दे के जरिए महिला मतदाताओं को साधने की कोशिश की जा रही है।

विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि पहले से लागू ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023’ के बावजूद नए संशोधन की टाइमिंग और मंशा पर सवाल उठते हैं। उनका तर्क है कि अगर सरकार गंभीर होती, तो मौजूदा 543 सीटों पर ही आरक्षण लागू किया जा सकता था, बजाय इसके कि परिसीमन के बाद बढ़ाई जाने वाली सीटों से इसे जोड़ा जाए।

फिलहाल, इस पूरे विवाद ने महिला आरक्षण के मुद्दे को फिर से केंद्र में ला दिया है, लेकिन इसके साथ ही यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या राष्ट्र के नाम संबोधन जैसे मंच का इस्तेमाल राजनीतिक संदेश देने के लिए किया जाना चाहिए।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

close