गुरुजी का अजब-गजब हाल: स्कूल पहुंचते ही कोई लटक रहा पेड़ से, तो कोई चढ़ रहा छत पर, शिक्षा विभाग के इस फरमान पर आप भी पीट लेंगे अपना सर…

Strange condition of teachers: As soon as they reached school, someone was hanging from a tree, while someone was climbing on the roof, you too will bang your head on this order of the education department...

Teacher News : शिक्षकों के लिए हर दिन विभाग की तरफ से नया-नया फरमान जारी होता है। लेकिन, वो फरमान सहूलियत से ज्यादा शिक्षकों के लिए सरदर्द बन जाता है। ऐसे में शिक्षक बच्चों को पढ़ाना छोड़कर उसी फरमान को मानने में जुटे रहते हैं। ये मामला मध्यप्रदेश का है। जहां शिक्षकों को ई अटेंडेंस बनाने का आदेश जारी हुआ है। लेकिन ई अटेंडेंस बनाने के लिए ना तो नेटवर्क उपलब्ध है और ना ही अन्य सुविधा।

 

पूरा मामला मध्य प्रदेश के आगर जिले का है। जिले के बड़ौद विकासखंड में शिक्षकों के लिए शासन का डिजिटल इनिशिएटिव ई-अटेंडेंस ऐप तैयार कर अटेंडेंस का आदेश दिया है। गांवों में मोबाइल नेटवर्क की गंभीर कमी के कारण शिक्षकों को अपनी दैनिक उपस्थिति दर्ज करने के लिए पेड़ों पर चढ़ना, ऊंचे स्थानों पर जाना, या घंटों सिग्नल तलाशना पड़ता है। यह दृश्य अब बड़ौद और आसपास के ग्रामीण स्कूलों में आम हो गया है।

 

डिजिटल ऐप, लेकिन नेटवर्क गायब

सरकारी शिक्षकों की उपस्थिति को पारदर्शी बनाने के लिए ई-अटेंडेंस ऐप को अनिवार्य किया है। उद्देश्य था — उपस्थिति प्रणाली में जवाबदेही और पारदर्शिता लाना।लेकिन बड़ौद, पिपल्या हमीर, सुदवास और अन्य गांवों के विद्यालयों में मोबाइल नेटवर्क ही नहीं मिलता, जिससे यह डिजिटल व्यवस्था व्यवहार में नाकाम साबित हो रही है।

शिक्षकों का कहना है कि स्कूल परिसर में होने के बावजूद ऐप उनकी लोकेशन कई सौ मीटर दूर दिखाता है। कई बार प्रयास करने पर भी ऐप ‘लोकेशन एरर’ बताता है। ऐसे में कुछ शिक्षक अपनी जान जोखिम में डालकर पेड़ों पर चढ़ते हैं, ताकि थोड़ा नेटवर्क मिल सके और वे उपस्थिति दर्ज कर पाएं।

 

समय और पढ़ाई दोनों बर्बाद

शिक्षकों के अनुसार, सुबह स्कूल पहुंचने के बाद कई बार एक से दो घंटे सिर्फ नेटवर्क खोजने में निकल जाते हैं। इस दौरान न सिर्फ उनका समय बर्बाद होता है, बल्कि विद्यार्थियों की कक्षाएं भी प्रभावित होती हैं।कई मामलों में ऐप में उपस्थिति दर्ज न हो पाने के कारण उन्हें विभागीय पोर्टल पर अनुपस्थित दिखा दिया जाता है, जिससे मानसिक तनाव और बढ़ जाता है।

पेड़ों पर चढ़ते और ऊंची जगहों पर जाते शिक्षक

गांवों के स्कूलों में अक्सर ऐसा दृश्य देखने को मिलता है कि शिक्षक हाथ में मोबाइल लिए पेड़ों की डाल पर या छत पर चढ़े दिखाई देते हैं। कुछ जगहों पर तो बच्चों के सामने शिक्षक मोबाइल पकड़कर आकाश की ओर उठाए सिग्नल तलाशते रहते हैं।

 

स्थानीय लोगों का कहना है कि बारिश या तेज हवा में यह स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है। नेटवर्क पकड़ने के चक्कर में कई बार शिक्षकों के फिसलने या चोट लगने की घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं।

 

शिक्षक बोले – डिजिटल व्यवस्था अच्छी, पर जमीनी हकीकत अलग

शिक्षकों का मानना है कि शासन का डिजिटलाइजेशन का उद्देश्य सही है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत किए बिना यह योजना कारगर नहीं हो सकती।उन्होंने मांग की है कि जिन क्षेत्रों में नेटवर्क कमजोर है, वहां सिग्नल बूस्टर या मोबाइल टॉवर लगाए जाएं, ताकि उन्हें अपनी उपस्थिति दर्ज करने में दिक्कत न हो और बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित न हो।

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