चुनावी गढ़ में बड़ी गड़बड़ी का संकेत, 5 अफसर सस्पेंड, आखिर किस बात से नाराज हुआ चुनाव आयोग
डायमंड हार्बर में निष्पक्षता पर उठे सवाल, सख्त कार्रवाई के बाद बढ़ा सियासी तापमान

नई दिल्ली। चुनावी माहौल के बीच एक ऐसी कार्रवाई सामने आई है जिसने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। भारत निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दौरान बड़ी सख्ती दिखाते हुए पांच पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। इन अधिकारियों पर चुनावी प्रक्रिया में निष्पक्षता बनाए रखने में विफल रहने और गंभीर कदाचार के आरोप लगे हैं।
यह पूरा मामला डायमंड हार्बर क्षेत्र से जुड़ा है, जिसे अभिषेक बनर्जी का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता है। ऐसे संवेदनशील इलाके में इस तरह की कार्रवाई ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
आयोग के मुताबिक, निलंबित अधिकारियों में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक संदीप गरई, एसडीपीओ सजल मंडल, डायमंड हार्बर थाना प्रभारी मौसम चक्रवर्ती, फाल्टा थाना प्रभारी अजय बाग और उस्थी थाना प्रभारी सुभेच्छा बाग शामिल हैं। इन सभी के खिलाफ विभागीय जांच भी शुरू कर दी गई है।
चुनाव आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव को भेजे निर्देश में साफ कहा है कि इन अधिकारियों का आचरण चुनावी निष्पक्षता के मानकों के खिलाफ पाया गया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर चिंता का विषय है। यही नहीं, डायमंड हार्बर की पुलिस अधीक्षक इशानी पाल को भी अपने अधीनस्थों पर नियंत्रण और निष्पक्षता सुनिश्चित न करने के लिए चेतावनी दी गई है।
आयोग ने पूरे मामले में तुरंत कार्रवाई करते हुए शनिवार सुबह 11 बजे तक विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं, जिससे साफ है कि मामला सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि बेहद संवेदनशील माना जा रहा है।
इधर, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। तमिलनाडु की 234 और पश्चिम बंगाल की 152 सीटों पर वोटिंग पूरी हो चुकी है, जबकि बंगाल की बाकी 142 सीटों पर 29 मई को मतदान होना है। दोनों राज्यों के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 92.9 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया, जो लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। 23 अप्रैल को हुए पहले चरण के मतदान में 44,376 मतदान केंद्रों में से किसी भी केंद्र पर पुनर्मतदान की जरूरत नहीं पड़ी।
हालांकि, इस सख्त कार्रवाई के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां बनीं कि चुनाव आयोग को सीधे निलंबन जैसा कड़ा कदम उठाना पड़ा। आने वाले दिनों में यह मामला राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बन सकता है।









