आप जेल में हैं क्योंकि अपने ही वादे निभाए नहीं…” राजपाल यादव को दिल्ली हाई कोर्ट से झटका, जमानत याचिका खारिज
चेक बाउंस और 15 साल पुराने लोन केस में फटकार, भतीजी की शादी में शामिल होने की अपील भी नहीं आई काम

बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। चेक बाउंस और लोन भुगतान से जुड़े मामले में उनकी जमानत याचिका अदालत ने खारिज कर दी है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जेल जाना उनकी अपनी गलती का नतीजा है।
गुरुवार को जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ के सामने मामले की सुनवाई हुई। राजपाल यादव की ओर से दलील दी गई कि उनके परिवार में 19 फरवरी को शादी है और उन्हें जमानत दी जाए ताकि वे समारोह में शामिल हो सकें। लेकिन अदालत ने इस अनुरोध को अस्वीकार करते हुए साफ कर दिया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
“दो दर्जन बार वादा… फिर भी भुगतान नहीं”
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि राजपाल यादव कई बार शिकायतकर्ता का पैसा लौटाने का आश्वासन दे चुके हैं, लेकिन अब तक भुगतान नहीं किया गया।
जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,
“राजपाल जेल गए हैं क्योंकि उन्होंने अपने ही वादे का पालन नहीं किया। कम से कम दो दर्जन बार कहा गया कि पैसे दे देंगे, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ।”
राजपाल के वकील ने कोर्ट को बताया कि भुगतान कर दिया जाएगा, लेकिन अदालत ने कहा कि हर बार यही बात दोहराई जाती है। ब्रेक से पहले जज ने वकील से कहा कि पैसे देने को लेकर स्पष्ट निर्णय लें।
वकील बोले – संपर्क नहीं हो पाया
दोपहर 2:30 बजे के बाद जब सुनवाई दोबारा शुरू हुई तो राजपाल के वकील ने बताया कि उन्होंने कई बार अपने मुवक्किल से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद बेल एप्लिकेशन दाखिल की गई।
हालांकि अदालत ने इस दलील को पर्याप्त नहीं माना और जमानत पर तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने अगली सुनवाई सोमवार के लिए तय की है और दूसरे पक्ष को बेल एप्लिकेशन पर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
भतीजी की शादी में ‘चीफ गेस्ट’ बनने की थी तैयारी
बेल एप्लिकेशन में राजपाल यादव ने उल्लेख किया था कि उनके भाई श्रीपाल यादव की बेटी की 19 फरवरी को शादी है और उन्हें परिवार की ओर से ‘चीफ गेस्ट’ के रूप में आमंत्रित किया गया है। उन्होंने शादी में शामिल होने की अनुमति मांगी थी।
लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि व्यक्तिगत कारणों के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती, खासकर तब जब बार-बार दिए गए आश्वासनों के बावजूद भुगतान लंबित हो।









