भारत आस्था और परंपराओं का देश है, जहां हर क्षेत्र की अपनी अलग पहचान और अनोखी मान्यताएं हैं। लेकिन बस्तर में निभाई जाने वाली एक परंपरा ऐसी है, जो सुनने में किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं लगती। यहां हर साल एक ऐसी अदालत लगती है, जहां इंसानों के नहीं बल्कि खुद भगवान और देवताओं के खिलाफ मुकदमे चलाए जाते हैं।
यह अनोखी जन अदालत भंगाराम देवी मंदिर में आयोजित होती है, जहां मानसून के दौरान ‘भादो जात्रा’ नामक तीन दिवसीय उत्सव मनाया जाता है। इसी दौरान सैकड़ों लोग अपनी शिकायतें लेकर पहुंचते हैं और देवताओं के खिलाफ केस दर्ज कराते हैं। मान्यता है कि इस अदालत की अध्यक्षता स्वयं भंगाराम देवी करती हैं और वही अंतिम फैसला सुनाती हैं।
इस परंपरा की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहां सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि मुर्गियां और अन्य पशु-पक्षी भी गवाह के रूप में पेश किए जाते हैं। लोग अपनी परेशानियां—जैसे फसल खराब होना, बीमारी या अन्य संकट—देवताओं की नाराजगी मानते हुए उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हैं।
सुनवाई के बाद यदि देवता ‘दोषी’ पाए जाते हैं, तो उन्हें सजा भी दी जाती है। सजा के तौर पर मंदिर में स्थापित मूर्तियों को कुछ समय के लिए मंदिर के पीछे रख दिया जाता है। कई बार यह सजा तब तक जारी रहती है, जब तक शिकायत करने वाले व्यक्ति की समस्या का समाधान नहीं हो जाता। समस्या सुलझने के बाद ही मूर्ति को फिर से उसके स्थान पर स्थापित किया जाता है।
इस अनोखे आयोजन में करीब 240 गांवों के लोग शामिल होते हैं। मुकदमों की सुनवाई के बाद सामूहिक भोज का आयोजन भी किया जाता है, जो इस परंपरा को सामाजिक एकता और विश्वास का प्रतीक बनाता है।
आस्था, न्याय और परंपरा का यह अनोखा संगम आज भी बस्तर की संस्कृति में जीवित है—जहां भगवान भी इंसानों के सवालों के घेरे में आते हैं और न्याय की इस अद्भुत प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं।