नयी दिल्ली/रांची। झारखंड में शिक्षक भर्ती मामले को हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा भर्ती मामले में अहम फैसला देते हुए देते हुए कहा कि “आरक्षण की वजह से शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता”। सुप्रीम कोर्ट ने भी वर्ष 2016 में बनी राज्य सरकार की नियोजन नीति को असंवैधानिक करार दिया है, लेकिन इस नीति से अनुसूचित जिलों में नियुक्त शिक्षकों की नियुक्ति को सुरक्षित कर दिया है। यानी अनुसूचित जिलों में जिन शिक्षकों की नियुक्ति हो गई है, उनकी सेवा बरकरार रहेगी। अदालत ने कहा कि आदिवासी बाहुल क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी है। ऐसे में अगर नियुक्ति किए गए शिक्षकों को हटाने का आदेश देते हैं, तो इससे वहां के छात्रों का नुकसान होगा। इसलिए जनहित को देखते हुए उनकी नियुक्ति को बरकरार रखी जाती है।

दरअसल झारखंड सरकार ने 13 अनुसूचित जिलों में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के सभी पदों को अनुसूचित जनजाति के लिए रिजर्व कर दिया था। इसके बाद गैर अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस निर्देश को असंवैधानिक बताया था। हाईकोर्ट ने सितंबर 2020 में राज्य सरकार के 2016 के आदेश पर रोक लगा दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की खंडपीठ ने राज्य सरकार को शेष पदों पर नियुक्ति के लिए एक कामन मेरिट लिस्ट बनाने का निर्देश दिया है। मेरिट लिस्ट में वैसे उम्मीदवारों को शामिल कर बनाया जाएगा । बेंच ने कहा था कि ज्यादा मेरिट वाले शिक्षकों की भर्ती पर रोक लगाकर स्कूल जाने वाले बच्चों की शिक्षा के साथ समझौता नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने तब पुरानी कट आफ लिस्ट के आधार पर नियुक्ति के आदेश दिये थे। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया था। राज्य सरकार की सुप्रीम कोर्ट में दलील थी कि अगर आदिवासी बच्चों को पढ़ाने के लिए स्थानीय आदिवासी युवाओं का चयन किया जायेगा तो भाषा समझने में आसानी होगी। सुप्रीम कोर्ट इस तर्क से सहमत नहीं था। कोर्ट ने कहा कि यह छोटी कक्षाओं के लिए तो समझ में आता है, लेकिन 5वीं से ऊपर किसी भी भाषा में बच्चों को सिखाया जा सकता है।

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