सुप्रीम कोर्ट : कोई कल भैंस ले आयेगा…आवारा कुत्तों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को सुना दिया, कहा- कैसे पता चलेगा, कुत्ता काटने के मूड में है या नहीं?

Supreme Court: Someone might bring a buffalo tomorrow... During the hearing on stray dogs, the Supreme Court reprimanded Kapil Sibal, saying, "How will we know if a dog is in the mood to bite or not?"

Supreme Court : कुत्तो को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए सवाल किया कि आखिर आम लोगों को आवारा कुत्तों की वजह से कब तक परेशानी झेलनी पड़ेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि उनका आदेश सड़कों के लिए नहीं, बल्कि स्कूलों, अस्पतालों, अदालतों और अन्य संस्थागत परिसरों तक सीमित है, जहां लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह जानवरों के अधिकारों के खिलाफ नहीं है, लेकिन इंसानों की जान और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

पीठ ने सवाल उठाया कि स्कूलों, अस्पतालों और कोर्ट परिसरों के भीतर आवारा कुत्तों की मौजूदगी की आखिर क्या जरूरत है और यदि इन्हें वहां से हटाया जाए तो इसमें आपत्ति क्यों होनी चाहिए। करीब ढाई घंटे तक बहस चली, जिसमें दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं।

मामले की बहस अधूरी रहने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई 8 जनवरी यानि कल सुबह 10:30 बजे तय की है। इधर, आवारा कुत्तों के पक्ष में पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि यदि कोई कुत्ता काटता है तो उसकी पहचान कर नसबंदी की जा सकती है।

इस पर अदालत ने व्यंग्यात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि “अब तो बस एक ही चीज बाकी रह गई है—कुत्तों को भी काउंसलिंग दी जाए, ताकि वापस छोड़े जाने के बाद वे किसी को काटें नहीं।”

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने यह भी कहा कि जब भी वह मंदिरों या धार्मिक स्थलों पर गए हैं, उन्हें कभी किसी कुत्ते ने नहीं काटा। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “आप खुशकिस्मत हैं। लोगों को काटा जा रहा है, बच्चों को काटा जा रहा है और कई मामलों में लोग अपनी जान तक गंवा रहे हैं।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि आवारा कुत्तों की वजह से सड़क दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ रहा है। अदालत ने सवाल किया कि यह कैसे तय किया जाएगा कि कौन सा कुत्ता खतरनाक है और कौन सा नहीं। “सुबह-सुबह कौन सा कुत्ता किस मूड में होगा, यह कोई नहीं जान सकता,” अदालत ने टिप्पणी की।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से पूछा कि वर्ष 2018 में एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों को लेकर जो सख्त निर्देश दिए गए थे, उनका प्रभावी क्रियान्वयन अब तक क्यों नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि नियमों के पालन में देरी से आम जनता को नुकसान उठाना पड़ रहा है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता केके वेणुगोपाल ने NALSAR, हैदराबाद की ओर से कुछ अहम आंकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि भारत में आवारा कुत्तों की कुल आबादी लगभग 5 करोड़ 25 लाख है।

इनके लिए जरूरी शेल्टर की संख्या 77,347 है, जबकि प्रति कुत्ता 40 वर्ग फुट जगह की आवश्यकता होती है। एक कुत्ते को रोजाना खिलाने का खर्च करीब 40 रुपये आता है। यदि 1.54 करोड़ कुत्तों को भोजन दिया जाए, तो प्रतिदिन लगभग 61 करोड़ 81 लाख रुपये का खर्च आएगा।

उन्होंने यह भी बताया कि देश के 1,94,412 स्कूलों में बिजली कनेक्शन तक काम नहीं कर रहा है और कई जगह शौचालय व पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। ऐसे हालात में स्कूलों से यह उम्मीद करना कि वे बाड़बंदी कर आवारा कुत्तों को रोकें, व्यावहारिक नहीं है।

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