भारत आ रहे रूसी तेल टैंकर अचानक चीन की तरफ मुड़े, क्या अमेरिकी प्रतिबंधों का असर?

Russian oil tankers coming to India suddenly turned towards China, is it the effect of US sanctions?

नई दिल्ली। रूस-यूक्रेन के मध्य जारी जंग के बीच पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का असर अब वैश्विक तेल व्यापार में साफ नजर आने लगा है। भारत और तुर्की की ओर जा रहे कई रूसी तेल टैंकर अब अपना रुख चीन की तरफ मोड़ते दिख रहे हैं। जानकारों का मानना है कि यह बदलाव अमेरिका और यूरोपीय संघ के सख्त प्रतिबंधों के डर और बढ़ती अनिश्चितता का नतीजा हो सकता है।
जानकारी के अनुसार हाल ही में पश्चिमी तुर्की के इजमित बंदरगाह पर पनामा के झंडे वाले टैंकर बेला-6 ने करीब एक लाख टन रूसी कच्चा तेल उतारा। यह डिलीवरी तुर्की की सबसे बड़ी रिफाइनरी कंपनी तुप्रास के लिए अपवाद मानी जा रही है, क्योंकि उसने यूरोपीय संघ के 21 जनवरी से लागू नए प्रतिबंधों से पहले रूसी तेल आयात में करीब 69 प्रतिशत की कटौती कर दी थी। नए ईयू नियमों के तहत रूसी कच्चे तेल से बने उत्पादों का यूरोप में आयात प्रतिबंधित कर दिया गया है, जिससे भारत और तुर्की जैसी रिफाइनरियों पर सीधा असर पड़ा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिकी प्रतिबंधों, ईरान और वेनेजुएला को लेकर अनिश्चितता तथा यूरोपीय संघ के नए फैसलों ने अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति को अस्थिर बना दिया है। लंदन स्थित जनरल इंडेक्स के विश्लेषक डेविड एडवर्ड का कहना है कि मौजूदा दौर असाधारण है, जहां भू-राजनीतिक उथल-पुथल सीधे ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर रही है।
इस बीच भारतीय रिफाइनरियों ने भी सतर्क रुख अपनाया है। केप्लर के विश्लेषक सुमित रितोलिया के अनुसार, भारत की प्रमुख रिफाइनरियों ने रूसी कच्चे तेल की खरीद कम कर ‘स्वैच्छिक पाबंदी’ लगा दी है। दिसंबर 2025 में भारत का रूसी तेल आयात 29 प्रतिशत घटकर तीन साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। इसके पीछे रूस की दिग्गज कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध भी बड़ी वजह माने जा रहे हैं।
भारत और तुर्की द्वारा छोड़े जा रहे इस अतिरिक्त रूसी तेल का एक हिस्सा चीन की ओर जा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर में रूस से चीन के समुद्री मार्ग से तेल आयात में 23 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। कई ऐसे टैंकर, जिन्हें भारत ने स्वीकार नहीं किया, चीनी बंदरगाहों के पास देखे गए। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की छोटी स्वतंत्र रिफाइनरियां, जिन्हें ‘टी-पॉट्स’ कहा जाता है, सस्ते तेल की खरीद में माहिर हैं और जोखिम उठाने को तैयार रहती हैं। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि चीन सभी छोड़े गए रूसी तेल को नहीं खपा पाएगा। फिर भी, बढ़ती छूट और सीमित जोखिम के चलते वह बड़ा खरीदार बना रह सकता है।



Related Articles

close