राज्यसभा में मुस्कान के पीछे छिपा सियासी इशारा… ‘मैं हाल ही में हटाया गया’ कहकर राघव चड्ढा ने खोल दी अंदर की कहानी

उपसभापति बने हरिवंश को बधाई के बीच ऐसा बयान, जिसने सदन में हंसी भी बिखेरी और कई सवाल भी खड़े कर दिए

नई दिल्ली। राज्यसभा में शुक्रवार को एक ऐसा पल देखने को मिला, जिसने औपचारिक बधाइयों के बीच अचानक सियासी हलचल पैदा कर दी। हरिवंश नारायण सिंह के लगातार तीसरी बार उपसभापति चुने जाने पर जहां पूरा सदन उन्हें शुभकामनाएं दे रहा था, वहीं आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने अपने अंदाज से माहौल को अलग मोड़ दे दिया।

बधाई भाषण के दौरान राघव चड्ढा ने जो कहा, उसने कुछ पल के लिए सदन को ठहाकों से भर दिया, लेकिन उसी के साथ एक गहरी सियासी परत भी सामने आ गई। उन्होंने कहा, “जिस पार्टी से मैं आता हूं, उसके लीडर मौजूद नहीं हैं, नए डिप्टी लीडर भी यहां नहीं हैं और मैं हाल ही में हटाया गया डिप्टी लीडर यहां मौजूद हूं।” इस एक लाइन ने इशारों-इशारों में पार्टी के अंदरूनी हालात की झलक दे दी।

हालांकि, अपने पूरे संबोधन में राघव चड्ढा ने हरिवंश नारायण सिंह के कार्यशैली की खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि उपसभापति का संतुलन और संयम सभी जनप्रतिनिधियों के लिए एक उदाहरण है। लेकिन इसी बीच उन्होंने यह भी संकेत दे दिया कि राजनीतिक दलों के भीतर भी ऐसे ही संयम और संवाद की जरूरत है।

अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने हरिवंश के साथ अपने रिश्ते को “खट्टा-मीठा” बताया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि जब वह विषय पर सटीक रहते हैं तो उन्हें “पर्ची और आशीर्वाद” मिलता है, लेकिन जैसे ही बात भटकती है, तो डांट भी पड़ती है। उन्होंने हल्के अंदाज में कहा कि अब वह कोशिश करेंगे कि यह रिश्ता पूरी तरह “मीठा-मीठा” बन जाए।

इतना ही नहीं, राघव चड्ढा ने सदन की कार्यवाही पर भी एक दिलचस्प मांग रख दी। उन्होंने कहा कि जब बोलने का समय खत्म होता है तो घंटी बजा दी जाती है, लेकिन अगर एक-दो मिनट का अतिरिक्त समय मिल जाए, तो सदस्य अपनी बात और मजबूती से रख सकते हैं।

इस दौरान उन्होंने सभापति सीपी राधाकृष्णन की भी सराहना की और कहा कि उनके कार्यकाल में ज्यादा सांसदों को ‘जीरो आवर’ में बोलने का अवसर मिल रहा है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए सकारात्मक बदलाव है।

उधर, हरिवंश नारायण सिंह ने एक बार फिर उपसभापति पद की जिम्मेदारी संभाल ली है। यह उनका तीसरा कार्यकाल है, जो उनके अनुभव और स्वीकार्यता को दर्शाता है। पत्रकारिता से राजनीति तक का उनका सफर और निर्विरोध निर्वाचन इस बात का संकेत है कि सदन में उनकी पकड़ मजबूत बनी हुई है।

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे ज्यादा चर्चा राघव चड्ढा के उस एक बयान की हो रही है, जिसने हंसी के बीच कई अनकहे सवाल छोड़ दिए। अब देखना यह होगा कि यह हल्का-फुल्का तंज आने वाले दिनों में किसी बड़े सियासी संकेत में बदलता है या फिर सदन की हंसी तक ही सीमित रह जाता है।

Related Articles

close