‘पानी में जहर’ या सिस्टम की चूक? गांव में 15 दिनों में 12 मौतें, दहशत में जी रहे लोग

दूषित जल और हेपेटाइटिस का कहर! बच्चों से बुजुर्ग तक कोई नहीं बचा
पलवल जिले के छांयसा गांव में पिछले दो हफ्तों से जो हो रहा है, उसने पूरे इलाके को दहला दिया है। महज 15 दिनों में 12 लोगों की रहस्यमयी मौत ने गांव को मातम और दहशत में डुबो दिया है। मरने वालों में 5 मासूम बच्चे भी शामिल हैं।
देश अभी इंदौर में दूषित पानी से हुई 16 मौतों की त्रासदी को भूला भी नहीं था कि अब हरियाणा से आई इस खबर ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
करीब 5,700 की आबादी वाले इस गांव में 8 साल के बच्चे से लेकर 75 साल के बुजुर्ग तक इस बीमारी की चपेट में आए हैं। गांव की गलियों में सन्नाटा है, हर घर में डर और अनिश्चितता का माहौल।
क्या है मौतों की असली वजह?
स्वास्थ्य विभाग की शुरुआती जांच में दूषित पेयजल और हेपेटाइटिस (काला पीलिया) संक्रमण को मुख्य कारण माना गया है।
27 जनवरी से 11 फरवरी के बीच 7 मौतों की पुष्टि हुई, जिनमें 4 मौतें तीव्र हेपेटाइटिस या लिवर फेलियर से जुड़ी बताई गईं। अन्य मामलों की भी समीक्षा जारी है।
अधिकांश मरीजों में बुखार, पेट दर्द, उल्टी और पीलिया जैसे लक्षण दिखे, जिसके बाद हालत तेजी से बिगड़ती चली गई।
ग्रामीणों का दावा है कि असली मौतों का आंकड़ा सरकारी संख्या (12) से ज्यादा हो सकता है, क्योंकि कई लोग निजी अस्पतालों में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं।
पानी की जांच में चौंकाने वाले खुलासे
अब तक 107 घरों से लिए गए पानी के नमूनों में से 23 फेल पाए गए हैं। जांच में बैक्टीरियल प्रदूषण और क्लोरीनेशन की भारी कमी सामने आई है।
स्टोरेज टैंकों में ‘कोलीफॉर्म बैक्टीरिया’ की मौजूदगी पाई गई, जो जलजनित बीमारियों का बड़ा कारण है। कई सैंपलों में क्लोरीन की मात्रा शून्य मिली — यानी पानी कीटाणु मुक्त ही नहीं था।
गांव की जलापूर्ति भूमिगत टैंकों और टैंकरों पर निर्भर है। अधिकारियों के मुताबिक टैंकों की अनियमित सफाई और कीटाणुनाशन की कमी ने हालात बिगाड़ दिए।
स्वास्थ्य विभाग अलर्ट, गांव में मेडिकल कैंप
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने रैपिड रिस्पांस टीम तैनात कर दी है।
1,500 से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग
800 से ज्यादा ओपीडी परामर्श
210 ब्लड सैंपल की जांच
15,000 क्लोरीन (हैलोजन) गोलियों का वितरण
रिपोर्ट में हेपेटाइटिस बी के 2 और हेपेटाइटिस सी के 9 मामले सामने आए हैं, जबकि हेपेटाइटिस A और E निगेटिव पाए गए।
तीन मरीज फिलहाल अस्पताल में भर्ती हैं और उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है। ग्रामीणों को केवल उबला या RO पानी पीने की सलाह दी गई है। प्रशासन बाहरी इलाकों से टैंकरों के जरिए साफ पानी मंगवा रहा है।
सिस्टम पर सवाल, कब थमेगा ‘जहरीले पानी’ का कहर?
छांयसा गांव की यह त्रासदी ऐसे वक्त सामने आई है जब देश के कई हिस्सों में पेयजल की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलापूर्ति व्यवस्था और नियमित फायर/सैनिटेशन ऑडिट पर सख्ती नहीं हुई, तो ऐसी घटनाएं आगे भी दोहराई जा सकती हैं।









