रांची क्रिसमस का त्यौहार धूमधाम से मना रहे हैं लंबे समय से सभी इसका इंतजार करते रहते हैं वहीं झारखंड की राजधानी में एक चर्च ऐसा भी है यहां क्रिसमस नहीं मनाया जाता। सेवंथ डे एंडवेटिस्ट नमक इस चर्च के अनुयाई यह मानते हैं कि बाइबल में ईसा मसीह की जन्म तारीख नहीं दी गई है इसलिए धार्मिक दृष्टिकोण से क्रिसमस के अवसर पर विशेष प्रार्थनाएं समारोह का आयोजन करना कहीं से उचित नहीं है।

सेवेंथ डे एंडवेंटिस्ट चर्च की पश्चिमी झारखंड इकाई के अध्यक्ष पास्टर सुजल किस्कू कहते हैं कि क्रिसमस पर विशेष प्रार्थना करना इतिहास के किसी राज्य वंश की कहानी को ईसाइयत के आध्यात्मिक आर्दशों पर थोपना है। इसलिए सेवंथ डे एड्वेंटिस्ट चर्च ईसाई का जन्म उत्सव मनाने से परहेज करता है।

पास्टर सुजल कहते हैं कि ईसा मसीह की जीवनी न्यू टेस्टामेंट में मार्क्स, मैथ्यू, ल्यूक और जॉन द्वारा लिखित सुसमाचारों में है। इनमें से किसी ने ईसा के जन्म की तारीख नहीं बताई है। न्यू टेस्टामेंट में ईसा के बाद के कई सौ साल बाद तक ईसाइयत के प्रचार का उल्लेख मिलता है। इनमें से कहीं भी क्रिसमस मनाने की चर्चा नहीं है। इसलिए किसी खास दिन उनकी विशेष प्रार्थना के बजाय हर दिन होनी चाहिए।

पास्टर सुजल किस्कू दावा करते हैं कि इतिहास में वर्णित एक प्रमुख तारीख को ईसा के जन्म दिवस के रूप में आरोपित किया गया है। पास्टर के अनुसार, बेबीलोन के इतिहास और दंतकथाओं में निमरोद नामक एक राजा था। उसके दरबारियों ने उसके बेटे मितरस को चमत्कारी कहना शुरू कर दिया। मितरस का जन्म 25 दिसंबर को हुआ था। जनता को मितरस का जन्म दिन मनाने और उसकी पूजा के लिए बाध्य किया गया। सालों-साल की यह परंपरा ईसाइयत ग्रहण करने के बाद भी बरकरार रही।

बेबीलोन से यह रोम पहुंचा। रोमन सम्राट कांटेस्टाइन के इसाई धर्म को राजधर्म घोषित करने के बाद 25 दिसंबर को ईसा का जन्म दिन क्रिसमस के रूप में मनाया जाने लगा। वहीं निमरोद की पत्नी और बेटे की मूर्ति को लोग मदर मेरी और जीसस की मूर्ति मानकर घरों और सार्वजनिक जगहों पर स्थापित करने लगे।

इस तरह 25 दिसंबर ईसा मसीह के जन्मोत्सव और फिर सांताक्लाज के उपहार और ऐसी ही कई चीजों के साथ मिलकर ईसाई धर्म के सबसे बड़े धार्मिक त्योहार का रूप ग्रहण करता चला गया। पश्चिमी देशों के उपनिवेश रहे इलाकों में गैर ईसाई भी जोर-शोर से इसे मनाने लगे।