झारखंड : भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है करम पर्व…जानें इसकी कहानी और महत्व
Karam festival is a symbol of brother-sister love... know its story and importance

झारखंड में करम पर्व आज पूरे धूम धाम के साथ मनाया जा रहा है. सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में करम पर्व का खास महत्व है.
यह त्योहार मुख्य रूप से भारत के झारखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है.
बहरहाल, आज के इस लेख में हम आपको बताएंगे ‘करम पर्व’ की रहस्यमयी कहानी? आखिर कैसे एक पेड़ की पूजा से जुड़ी है भाई-बहन के प्रेम और खुशहाली की गाथा. क्या है महत्व और किस तरह से यह पर्व मनाया जाता है.
क्यों मनाया जाता है करम पर्व?
करमा पर्व, प्रकृति, आस्था और परंपरा का संगम है. करम देवता को धरती की उर्वरता और सुख-समृद्धि का देवता माना जाता है. यह पर्व आदिवासी समुदाय और सदानों (गैर-आदिवासी) के बीच भाई-बहन के अटूट प्रेम, प्रकृति पूजा और कृषि संस्कृति को दर्शाता है. यह भाद्रपद (भादो) महीने की एकादशी तिथि को मनाया जाता है.
करम पर्व को मनाने के पीछे कई महत्वपूर्ण मान्यताएं भी हैं
- भाई-बहन का प्रेम: यह पर्व मुख्य रूप से भाई-बहन के रिश्ते को समर्पित है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं. यह पर्व राखी की तरह ही भाई-बहन के बंधन को मजबूत करता है.
- प्रकृति पूजा: करम पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है। आदिवासी समुदाय प्रकृति को ही अपना देवता मानते हैं. इस पर्व में करम वृक्ष की डाली (करम डाली) को ईश्वर का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की जाती है. यह हमें सिखाता है कि प्रकृति और मनुष्य के बीच सामंजस्य और संतुलन होना आवश्यक है.
- फसल और समृद्धि: यह एक फसल उत्सव भी है। किसान और आदिवासी समाज इस पर्व को अच्छी फसल और सुख-समृद्धि के लिए मनाते हैं. वे करम देवता को धरती की उर्वरता और खुशहाली का देवता मानते हैं.
- ‘कर्म’ का महत्व: “करमा” शब्द “कर्म” (परिश्रम) और “करम” (भाग्य) को दर्शाता है. इस पर्व के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि मनुष्य को नियमित रूप से अच्छे कर्म करने चाहिए, जिससे उसका भाग्य भी साथ दे.
करम पर्व से पहले कैसी होती है तैयारियां?
जानकारी के अनुसार, ‘करम पर्व’ से पहले गांव की महिलाएं और युवतियां घर-घर जाकर धान, मक्का, चना और गेहूं इकट्ठा करती हैं. इसी से जावा बोया जाता है.
पर्व की रात करमा डाली की स्थापना होती है, जिसके चारों ओर गांव वाले एकत्र होकर गीत और नृत्य में भाग लेते हैं. महिलाएं पारंपरिक परिधान पहनती हैं और पुरुष ढोल-मांदर की थाप पर थिरकते हैं. करमा गीतों में भाई-बहन का स्नेह, प्रकृति का महत्व और जीवन की खुशहाली का चित्रण झलकता है.
करम पर्व की मान्यताएं और महत्व
- पौराणिक कथा: करम पर्व से जुड़ी “करमा-धरमा” नामक एक कथा बहुत प्रचलित है। कथा के अनुसार, करम और धरमा नाम के दो भाई थे.करमा ने कर्म के महत्व को बताया और धरमा ने शुद्ध आचरण और धार्मिक जीवन का मार्ग दिखाया. एक कथा के अनुसार, कर्म देवता की कृपा से ही एक गरीब परिवार के पास धन-संपत्ति वापस आई थी. इसलिए इस कथा को पूजा के दौरान सुनाया जाता है.
- करम डाली और जावा: इस पर्व में करम की डाली का विशेष महत्व है। पूजा से कुछ दिन पहले, करमईन (पूजा करने वाली युवतियां) नदी से बालू लाकर टोकरी में भरती हैं और उसमें पांच या सात प्रकार के अनाज के बीजों को बोती हैं। इसे “जावा उठाना” कहते हैं। इन बीजों से अंकुर फूटने के बाद उनकी पूजा की जाती है. पूजा के दिन करम की डाली को आंगन में स्थापित किया जाता है.
- सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व: यह पर्व सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है. यह पर्व नाच-गाने, पारंपरिक गीतों और सामुदायिक समारोहों के साथ मनाया जाता है, जिससे समाज में एकता और सद्भाव बढ़ता है.









