जाके राखे साइयां… मौत के मुंह से लौट आया युवक! पैरासिटिक इन्फेक्शन से जूझ रहे 25 साल के मरीज को मिली नई जिंदगी

 दिमाग-फेफड़े-दिल तक फैल चुका था जानलेवा संक्रमण, डॉक्टरों की सूझबूझ ने कर दिखाया चमत्कार

नई दिल्ली।जाके राखे साइयां, मार सके ना कोई”—यह कहावत एक बार फिर सच साबित हुई, जब दिल्ली के एक अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने मौत से जूझ रहे 25 साल के युवक को नई जिंदगी दे दी।
युवक एक ऐसी बेहद दुर्लभ और जानलेवा बीमारी से पीड़ित था, जिसने उसके दिमाग, फेफड़ों और दिल तक को अपनी चपेट में ले लिया था। यह बीमारी थी—सेरेब्रल अमीबियासिस, जो Entamoeba histolytica नामक खतरनाक परजीवी से होती है।

 दो महीने, दो अस्पताल… लेकिन बीमारी बनी रहस्य

यह युवक करीब दो महीने तक दो बड़े अस्पतालों में भर्ती रहा, लेकिन उसकी बीमारी की असली वजह सामने नहीं आ सकी।
लगातार बुखार, कमजोरी और बिगड़ती हालत के बीच:

  • छाती में ट्यूब डाली गई

  • फेफड़ों की बायोप्सी कराई गई

  • टीबी के शक में टीबी की दवाएं दी गईं

लेकिन हर कोशिश नाकाम रही। मरीज की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती चली गई, और जिंदगी हाथ से फिसलती नजर आने लगी।

 PSRI हॉस्पिटल पहुंचा तो हालत थी बेहद गंभीर

जब युवक PSRI हॉस्पिटल, दिल्ली पहुंचा, तब हालात बेहद नाजुक थे।

  • लगातार दौरे पड़ रहे थे

  • सिर में तेज दर्द

  • होश कम हो रहा था

  • गर्दन अकड़ी हुई थी

  • तेज बुखार बना हुआ था

जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए—
 दिमाग में गांठ
 बाएं फेफड़े में जमाव
 दिल के दाहिने हिस्से में भी गांठ

इसके बावजूद अब तक दिया गया इलाज कोई असर नहीं दिखा रहा था।

 डॉक्टरों की सूझबूझ ने बदली किस्मत

सीनियर फिजिशियन डॉ. मनीष मोहिल के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने केस को नए सिरे से परखा।
इलाज कर रहे डॉ. अमिताभ गुप्ता ने एक असामान्य लेकिन घातक संभावना पर ध्यान दिया—
 Entamoeba histolytica से होने वाला सेरेब्रल अमीबियासिस

डॉ. गुप्ता ने बताया,

“अमीबियासिस आमतौर पर आंतों या लिवर तक सीमित रहता है। इसका दिमाग तक पहुंचना बेहद दुर्लभ है। दुनिया में ऐसे 6 से भी कम मामले दर्ज हैं और अधिकतर जानलेवा साबित हुए हैं।”

 48 घंटे में दिखा चमत्कारी असर

डॉक्टरों ने तुरंत मेट्रॉनिडाजोल दवा से इलाज शुरू किया।
नतीजा हैरान करने वाला था—
 48 घंटे के भीतर

  • बुखार कम हुआ

  • दौरे थमे

  • मरीज की हालत में तेजी से सुधार

बाद में खून और सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड टेस्ट से पुष्टि हुई कि शरीर में वाकई पैरासिटिक इन्फेक्शन मौजूद था।

 लिवर सुरक्षित, फिर भी जानलेवा हमला!

डॉ. अमिताभ गुप्ता के अनुसार,

“इस केस की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि मरीज का लिवर पूरी तरह स्वस्थ था, जबकि संक्रमण सीधे दिमाग, फेफड़ों और दिल तक फैल गया था—जो आमतौर पर नहीं होता।”

 यह केस क्या सिखाता है?

डॉक्टरों का कहना है कि जब:

  • मरीज कई अंगों से जुड़ी गंभीर बीमारी से जूझ रहा हो

  • सामान्य इलाज असर न दिखा रहा हो

तो दुर्लभ पैरासिटिक इन्फेक्शन की संभावना को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
समय पर सही पहचान न हो, तो ऐसे मामलों में मौत लगभग तय मानी जाती है।

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