हड्डी टूटी नहीं, खून बहा नहीं… तो पिटाई जायज़? यहाँ का नया कानून सुनकर कांप उठी दुनिया

90 पन्नों का क्रिमिनल कोड लागू, पतियों को ‘सीमित मारपीट’ की छूट; महिलाओं के लिए न्याय का रास्ता और भी मुश्किल

नई दिल्ली। अफगानिस्तान में सत्ता पर काबिज़ तालिबान सरकार ने ऐसा नया क्रिमिनल कोड लागू किया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ह्यूमन राइट्स संगठनों की नींद उड़ा दी है। 90 पन्नों के इस कानून पर सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा के हस्ताक्षर के बाद अब यह आधिकारिक रूप से लागू हो चुका है—और इसके कई प्रावधान महिलाओं और बच्चों के अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

 कानून में क्या है ऐसा, जिससे मचा बवाल?

इस नए कोड में इस्लामी धर्मग्रंथों की पुरानी व्याख्याओं को आधार बनाकर कई कठोर नियम शामिल किए गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इसमें पतियों और पिताओं को “निर्धारित सीमा” में महिलाओं और बच्चों को शारीरिक सजा देने की अनुमति दी गई है।

कानून के अनुसार, यदि सजा के दौरान “हड्डी न टूटे और त्वचा न कटे”, तो इसे गंभीर अपराध की श्रेणी में नहीं माना जाएगा। यही वह लाइन है, जिसने वैश्विक स्तर पर आक्रोश को जन्म दिया है।

धार्मिक नेताओं को लगभग छूट, आम लोगों के लिए सख्ती

इस कोड में धार्मिक विद्वानों और ऊंचे पदों पर बैठे मौलवियों को कानूनी जांच से लगभग छूट दी गई है, जबकि मजदूर वर्ग और आम नागरिकों के लिए कठोर दंड का प्रावधान रखा गया है। इससे समाज को स्पष्ट रूप से सख्त वर्गों में बांटने की कोशिश दिखाई देती है।

गंभीर अपराधों के मामलों में शारीरिक सजा “सुधार सेवाओं” की बजाय इस्लामी मौलवियों द्वारा दी जाएगी। वहीं कम गंभीर मामलों में पति को पत्नी को पीटकर दंड देने की इजाजत दी गई है।

 रिश्तेदारों से मिलने पर भी जेल?

कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि कोई महिला अपने पति की अनुमति के बिना रिश्तेदारों से मिलने जाती है, तो उसे तीन महीने तक की जेल हो सकती है। इतना ही नहीं, ‘गुलामी’ जैसी प्रथाओं को भी मान्यता देने की बात सामने आई है।

 न्याय की राह भी कांटों भरी

हालांकि कानून यह कहता है कि अगर किसी महिला पर हमला होता है तो उसे न्याय मिल सकता है, लेकिन इसके लिए उसे अदालत में अपने घाव दिखाकर यह साबित करना होगा कि उसे गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचा है—और वह भी पूरी तरह से ढके रहने की शर्त के साथ।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यदि कोई महिला तमाम सामाजिक और कानूनी बाधाओं को पार कर यह साबित कर दे कि उसके पति ने उस पर गंभीर हमला किया, तब भी आरोपी पति को अधिकतम 15 दिन की ही सजा मिल सकती है।

 दुनिया की नजरें अफगानिस्तान पर

मानवाधिकार समूहों का कहना है कि यह कानून महिलाओं को लगभग दासों की स्थिति में पहुंचा देता है और उनके मौलिक अधिकारों को सीमित कर देता है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि आगे इस पर कैसी प्रतिक्रिया आती है।

अफगानिस्तान में लागू यह नया कानून सिर्फ एक देश का अंदरूनी मामला नहीं रह गया है—यह महिलाओं की स्वतंत्रता, न्याय और मानवाधिकारों पर वैश्विक बहस का केंद्र बन चुका है।

 

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