Charak Review: आस्था या खौफनाक अंधविश्वास? ‘चरक’ में दिखी नरबलि की सिहराने वाली कहानी, क्लाइमेक्स देख दहल जाएंगे आप

बंगाल के चरक मेले की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म में बच्चों के गायब होने, तांत्रिक प्रथाओं और नरबलि के डरावने सच को दिखाया गया है

Charak Review: आस्था की आड़ में छिपे अंधविश्वास का खौफनाक चेहरा

मुंबई। धर्म और आस्था के नाम पर अंधविश्वास किस हद तक लोगों को खौफनाक रास्तों पर ले जा सकता है, इसे बेहद सिहराने वाले अंदाज में दिखाती है फिल्म Charak: Fair of Faith। फिल्म की कहानी बंगाल में लगने वाले चरक मेले और उससे जुड़ी रहस्यमयी व तांत्रिक परंपराओं के इर्द-गिर्द घूमती है।

कहानी का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि संतान सुख पाने के लिए किसी दूसरे के बच्चे की बलि देने जैसे खतरनाक अंधविश्वास को इसमें दिखाया गया है। यही वजह है कि फिल्म कई जगह दर्शकों को अंदर तक झकझोर देती है।

Charak Review:कहानी: मेले की भीड़ में गायब हो जाते हैं बच्चे

फिल्म की कहानी चांदपुर में लगने वाले चरक मेले से करीब दो सप्ताह पहले शुरू होती है। बिकास और सुकुमार बचपन के घनिष्ठ दोस्त हैं। बिकास के बेटे बिरसा को निसंतान सुकुमार और उसकी पत्नी बेहद प्यार करते हैं।

इसी बीच मेले की तैयारियां शुरू होती हैं और दूसरी ओर जुआ में हारा जगन बिकास से अपने पैसे वापस मांगता है। पैसे न मिलने पर वह उससे बदला लेने की ठान लेता है। इसी दौरान चरक मेले की हलचल के बीच बिरसा और उसका दोस्त कानू अचानक लापता हो जाते हैं।

इसके बाद कहानी में रहस्य और डर का माहौल गहरा जाता है—क्या इन बच्चों का अपहरण हुआ है या किसी खौफनाक तांत्रिक अनुष्ठान के लिए उनकी बलि दी जाने वाली है? यही सवाल पूरी फिल्म में रोमांच बनाए रखते हैं।

Charak Review:आस्था और अंधविश्वास के बीच की पतली रेखा

फिल्म का निर्देशन Shiladitya Moulik ने किया है और कहानी में समाज के कई संवेदनशील मुद्दों को जोड़ा गया है। इसमें दिखाया गया है कि संतान न होने पर अक्सर समाज महिलाओं को दोषी ठहराता है।

कहानी में पुलिस इंस्पेक्टर सुभाष शर्मा और उनकी पत्नी शेफाली की कहानी भी दिखाई गई है, जिनकी शादी को 12 साल हो चुके हैं लेकिन उनके कोई संतान नहीं है। इसी कारण वे भी अंधविश्वास और तांत्रिकों के चक्कर में पड़ जाते हैं।

फिल्म का पहला भाग मुख्य रूप से चरक मेले की तैयारियों और उससे जुड़ी परंपराओं को दिखाने में बीतता है। वहीं इंटरवल के बाद कहानी तेजी से आगे बढ़ती है और क्लाइमेक्स दर्शकों को चौंका देता है।

Charak Review:कुछ दृश्य कर सकते हैं विचलित

फिल्म में कुछ ऐसे दृश्य भी हैं जो संवेदनशील दर्शकों को विचलित कर सकते हैं। जैसे शरीर को लोहे की छड़ों से भेदने की रस्में और अघोरियों के डरावने अनुष्ठान।

फिल्म के अंत में अखबारों की कुछ खबरों की क्लिप भी दिखाई जाती है, जिनमें आधुनिक समय में भी नरबलि जैसी गैरकानूनी घटनाओं का जिक्र किया गया है। यह फिल्म के संदेश को और ज्यादा प्रभावी बना देता है।

तकनीकी पक्ष और अभिनय

तकनीकी रूप से फिल्म मजबूत नजर आती है। विशाख ज्योति का संगीत कहानी के माहौल को और रहस्यमय बनाता है। वहीं सिनेमेटोग्राफी में गांव की प्राकृतिक खूबसूरती और चरक मेले के रंगों को प्रभावी ढंग से दिखाया गया है।

अभिनय की बात करें तो अंजलि पाटिल और शहीदुर रहमान ने अपने किरदारों को प्रभावशाली तरीके से निभाया है। सुब्रत दत्त, मनोश्री बिस्वास और अन्य कलाकार भी अपनी भूमिकाओं में प्रभाव छोड़ते हैं। बाल कलाकार शंखदीप और शौमल श्यामल ने भी शानदार अभिनय किया है।

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