ब्रेकिंग : UGC के नये रूल पर सुप्रीम कोर्ट ने लगायी रोक, “समाज बिखर जायेगा, बेहद ही खतरनाक परिणाम होंगे” सरकार को नोटिस, पढ़िये कोर्ट में क्या-क्या हुआ..
Breaking: Supreme Court puts a stay on the new UGC rule, "Society will disintegrate, there will be very dangerous consequences" notice to the government, read what happened in the court..

UGC Rule : UGC के नये कानून पर पूरे देश में बवाल मचा है। विरोध प्रदर्शन के बीच ये मामला सर्वोच्च अदालत पहुंच गया, जहां नए नियमों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर गुरुवार को सुनवाई हुई। आज सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने हुई सुनवाई के बाद कोर्ट ने बड़ा फैसला किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नियम पर फिलहाल रोक लगा दी है। इस मामले में अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की गई है। बता दें कि 23 जनवरी, 2026 को यूजीसी की ओर से उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना के लिए नई गाइडलाइंस को अधिसूचित किया गया था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति ज्योमाल्या बागची की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यूजीसी नियमों का सेक्शन 3C जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित करता है, जबकि सामान्य वर्ग को इससे बाहर रखा गया है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
बहस के दौरान याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि भेदभाव केवल किसी एक विशेष वर्ग तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह सभी नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा विषय है। यूजीसी द्वारा दी गई भेदभाव की परिभाषा संविधान की भावना और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के कई निर्णयों के विपरीत है। अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि इस तरह के नियम समाज में वैमनस्य को बढ़ावा देंगे और समानता के सिद्धांत को कमजोर करेंगे।
याचिका की सुनवाई के दौरान रैगिंग से जुड़े संभावित दुरुपयोग का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया गया। याचिकाकर्ताओं ने आशंका जताई कि नए नियमों के तहत रैगिंग जैसी घटनाओं का गलत इस्तेमाल हो सकता है। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा,
“आजादी के 75 साल बाद भी हम समाज को जातियों से मुक्त नहीं कर सके हैं। अब यह सोचना होगा कि क्या इस नए कानून से हम और पीछे की ओर जा रहे हैं?”
न्यायमूर्ति ज्योमाल्या बागची ने सामाजिक न्याय से जुड़े कानूनों में संतुलन और सुरक्षा उपायों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संविधान राज्य को एससी और एसटी के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार देता है, लेकिन ऐसे कानूनों में दुरुपयोग से बचाव के उपाय भी होने चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि हमें ऐसे हालात नहीं बनाने चाहिए, जहां समाज विभाजन की ओर बढ़े, जैसा कि कभी अमेरिका में स्कूलों के अलगाव के दौर में देखा गया था।
ए
क अन्य याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि यदि कोई सामान्य वर्ग का छात्र रैगिंग का शिकार होता है और आरोपी सीनियर किसी आरक्षित वर्ग से संबंधित है, तो शिकायत की स्थिति में सामान्य वर्ग के छात्र के पास कोई प्रभावी कानूनी सहारा नहीं बचेगा।
उन्होंने कहा कि रैगिंग की परिभाषा को नियमों से हटा दिया गया है और नए विनियम केवल जाति आधारित मुद्दों तक सीमित हैं, जो जमीनी हकीकत को पूरी तरह संबोधित नहीं करते।
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से यूजीसी के रेगुलेशन को निरस्त करने और उन पर तत्काल रोक लगाने की मांग की। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अदालत अनुमति दे, तो वे इससे बेहतर और संतुलित नियमों का मसौदा तैयार कर सकते हैं। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि अदालत चाहती है कि कुछ वरिष्ठ कानूनविदों की एक समिति इस पूरे विषय पर गंभीरता से विचार करे।









