BREAKING: असम चुनाव में सन्नाटा या तूफान? युवा चेहरों की एंट्री ने बढ़ाया ऐसा सस्पेंस, क्या बदल देंगे सत्ता का गणित या छिपा है कोई बड़ा उलटफेर?
पहली बार वोट डालने वाली लाखों युवा आबादी और नए उम्मीदवारों की एंट्री ने असम की राजनीति में पैदा कर दी है अनिश्चितता और सस्पेंस

गुवाहाटी, 28 मार्च: असम में 9 अप्रैल को होने वाले चुनाव इस बार सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि एक ऐसे सियासी बदलाव की आहट बन चुके हैं, जिसने पुराने समीकरणों को हिला कर रख दिया है। राज्य में 6.28 लाख से ज्यादा पहली बार वोट डालने वाले युवा मतदाता इस चुनाव को बेहद खास बना रहे हैं। लेकिन असली कहानी सिर्फ वोटरों की नहीं, बल्कि उन युवा चेहरों की है जो अब सीधे चुनावी मैदान में उतरकर परंपरागत राजनीति को चुनौती दे रहे हैं। यही वजह है कि इस बार का चुनाव एक अनजाने परिणाम और चौंकाने वाले उलटफेर की ओर इशारा कर रहा है।
असम के सभी 126 निर्वाचन क्षेत्रों में इस बार उम्मीदवारों का प्रोफाइल तेजी से बदला है। जहां पहले राजनीति कुछ चुनिंदा परिवारों के इर्द-गिर्द घूमती थी, वहीं अब पढ़े-लिखे पेशेवर, पीएचडी धारक और जमीनी स्तर से जुड़े कार्यकर्ता सीधे जनता के बीच पहुंचकर अपनी जगह बना रहे हैं। इनके पास न सिर्फ नई सोच है, बल्कि मुद्दों पर आधारित राजनीति का ऐसा एजेंडा है, जो युवाओं को तेजी से आकर्षित कर रहा है।
गुवाहाटी सेंट्रल से असम जातीय परिषद की उम्मीदवार कुनकी चौधरी इस बदलाव का सबसे चर्चित चेहरा बनकर उभरी हैं। लंदन विश्वविद्यालय से पढ़ाई पूरी करने के बाद कॉर्पोरेट करियर छोड़कर राजनीति में आना उनके फैसले को और रहस्यमय बनाता है। उनका फोकस कौशल विकास, महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण पर है, लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या उनकी यह नई सोच जमीनी राजनीति में टिक पाएगी या सियासत के पुराने खिलाड़ी उन्हें पीछे छोड़ देंगे।
समागुरी से कांग्रेस के 27 वर्षीय तंजिल हुसैन की एंट्री ने भी हलचल मचा दी है। कम उम्र और राजनीतिक परिवार से जुड़ाव ने जहां उन्हें चर्चा में ला दिया है, वहीं भाई-भतीजावाद का आरोप भी उनके पीछे-पीछे चल रहा है। पिछली हार के बावजूद पार्टी का भरोसा उन पर कायम है, लेकिन क्या जनता भी उन्हें दूसरा मौका देगी, यह अब भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
मार्गरेट्टा से रायजोर दल के राहुल छेत्री का नाम एक अलग ही कहानी बयां करता है। चाय बागान से जुड़े परिवार से आने वाले राहुल ने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ आंदोलनों से अपनी पहचान बनाई। उनका नारा “भूमि और लोग बनाम पैसा और शक्ति” युवाओं के बीच तेजी से गूंज रहा है, लेकिन यह भी साफ है कि उनकी राह आसान नहीं है और मुकाबला बेहद कांटे का होने जा रहा है।
मारियानी से रायजोर दल की उम्मीदवार ज्ञानश्री बोरा ने भी राजनीति में एक अनोखा रास्ता चुना है। एक पीएचडी धारक होने के बावजूद उन्होंने ऊंची सैलरी वाली नौकरी छोड़कर सामाजिक आंदोलनों का रास्ता अपनाया। उनका अभियान स्वास्थ्य सेवाओं, महिलाओं की सुरक्षा और स्थानीय प्रशासन को मजबूत करने पर केंद्रित है, लेकिन उनके फैसले ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या आदर्शवादी सोच सियासत की हकीकत से टकराकर टिक पाएगी।
बराक घाटी में अल्गापुर-कातलीचेरा सीट से कांग्रेस के जुबैर अनाम मजूमदार भी एक अहम युवा चेहरा बनकर उभरे हैं। एक आर्किटेक्ट के रूप में करियर शुरू करने के बाद उन्होंने छात्र राजनीति के जरिए अपनी पकड़ बनाई। नए बने निर्वाचन क्षेत्र में उनकी रणनीति और संगठनात्मक अनुभव उन्हें मजबूत बनाता है, लेकिन यहां भी नतीजा पूरी तरह अनिश्चित नजर आ रहा है।
वहीं हाफलोंग के पहाड़ी इलाके में भाजपा की रुपाली लंगथसा युवा नेतृत्व का एक अलग ही आयाम पेश करती हैं। जनजातीय क्षेत्रों में उनके अनुभव और काम ने उन्हें एक मजबूत उम्मीदवार बनाया है, लेकिन पहाड़ी राजनीति की जटिलताओं के बीच उनका सफर भी आसान नहीं माना जा रहा।
इन सभी युवा चेहरों में एक समानता जरूर दिखती है—पुरानी राजनीति को चुनौती देने की जिद और बदलाव की चाह। लेकिन असली सस्पेंस यही है कि क्या ये नई लहर वाकई सत्ता के समीकरण बदल पाएगी या फिर आखिरी वक्त में पारंपरिक राजनीति एक बार फिर अपना दबदबा साबित कर देगी। असम का यह चुनाव अब सिर्फ परिणाम नहीं, बल्कि एक ऐसी कहानी बनता जा रहा है जिसका अंत अभी पूरी तरह अनजान और रोमांच से भरा हुआ है।









