चुनाव से ठीक पहले बड़ा फैसला! ‘केरल’ नहीं अब होगा ‘केरलम’…मोदी कैबिनेट की मुहर से गरमाया सियासी माहौल…

क्या बदलने वाली है राजनीति की तस्वीर?भाषाई पहचान या चुनावी चाल?

नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम। विधानसभा चुनावों की आहट के बीच देश की राजनीति में एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला सामने आया है। ‘केरल’ अब आधिकारिक रूप से ‘केरलम’ कहलाने की दिशा में बढ़ चुका है। केंद्र की मोदी कैबिनेट ने नाम परिवर्तन से जुड़े विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिससे सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है।

सूत्रों के मुताबिक, आज हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में ‘केरल’ का नाम बदलकर ‘केरलम’ (Keralam) करने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी गई। इस फैसले को राज्य की भाषाई पहचान और सांस्कृतिक विरासत को संवैधानिक मान्यता देने की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है।

पहले विधानसभा से हरी झंडी

गौरतलब है कि केरल विधानसभा पहले ही सर्वसम्मति से आधिकारिक रिकॉर्ड में राज्य का नाम ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव पारित कर चुकी थी। राज्य सरकार का तर्क था कि ‘केरलम’ शब्द मलयालम भाषा और स्थानीय उच्चारण के अधिक निकट है, इसलिए इसे आधिकारिक रूप दिया जाना चाहिए।

अब केंद्र सरकार इस प्रस्ताव को संविधान की आठवीं अनुसूची में संशोधन के लिए अंतिम सिफारिश के रूप में आगे बढ़ाएगी। प्रक्रिया पूरी होने के बाद देशभर में राज्य का नाम औपचारिक रूप से ‘केरलम’ हो जाएगा।

चुनाव से पहले सियासी तापमान हाई

हालांकि, यह फैसला ऐसे समय आया है जब राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में विपक्षी दल इसे केवल सांस्कृतिक कदम नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय अस्मिता और पहचान के मुद्दे चुनावों में बड़ा असर डाल सकते हैं।

क्या बदलेगा आम लोगों के लिए?

नाम बदलने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सरकारी दस्तावेजों, बोर्ड, आधिकारिक पत्राचार और विभिन्न संवैधानिक रिकॉर्ड में ‘केरल’ की जगह ‘केरलम’ लिखा जाएगा। हालांकि आम जनता के दैनिक जीवन पर इसका सीधा असर सीमित ही रहने की संभावना है।

फिलहाल, इस फैसले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है — क्या यह कदम सिर्फ सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने के लिए है, या फिर चुनावी मौसम में सियासी समीकरण साधने की बड़ी रणनीति?

अब सबकी निगाहें आगे की संवैधानिक प्रक्रिया और चुनावी मैदान में इसके असर पर टिकी हैं।

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