झारखंड हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : CISF असिस्टेंट कमांडेंट के विज्ञापन पर रोक लगाने से इंकार, लेकिन, रिजल्ट को हाईकोर्ट ने रख दी ये शर्त

झारखंड हाईकोर्ट ने CISF असिस्टेंट कमांडेंट भर्ती नियम 2009 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। हाईकोर्ट ने UPSC की भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार किया, लेकिन नियुक्तियों को अंतिम फैसले के अधीन रखा।

 

रांची: झारखंड हाईकोर्ट में CISF (केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल) के असिस्टेंट कमांडेंट भर्ती नियम 2009 को चुनौती देने वाली याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। कोर्ट ने इस मामले में एक संतुलित रुख अपनाते हुए संघ लोक सेवा आयोग द्वारा जारी भर्ती विज्ञापन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि इस विज्ञापन के आधार पर होने वाली नियुक्तियां अंतिम निर्णय के अधीन रहेंगी।

इस मामले में प्रार्थी की ओर से हस्तक्षेप याचिका (आईए) दायर कर यह मांग की गई कि जब तक इस याचिका पर अंतिम फैसला नहीं हो जाता, तब तक UPSC द्वारा जारी विज्ञापन संख्या 8/26 के तहत असिस्टेंट कमांडेंट पदों पर भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए। हालांकि, कोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया।

खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर शामिल थे, ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया जारी रह सकती है, लेकिन इससे होने वाली नियुक्तियां इस मामले के अंतिम फैसले से प्रभावित होंगी। साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि अभ्यर्थियों को इस तथ्य की स्पष्ट जानकारी दी जाए, ताकि वे पूरी पारदर्शिता के साथ प्रक्रिया में शामिल हो सकें।

याचिकाकर्ता मनोहर बरुआ ने CISF के असिस्टेंट कमांडेंट रिक्रूटमेंट रूल 2009 को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी है। उनका तर्क है कि Department of Personnel and Training (DoPT) की गाइडलाइन के अनुसार, किसी भी भर्ती नियम की हर पांच साल में समीक्षा की जानी चाहिए, लेकिन 2009 के बाद से इस नियम का पुनरावलोकन नहीं किया गया।

याचिका में यह भी कहा गया है कि CISF के अन्य विंग्स में असिस्टेंट कमांडेंट के 100 प्रतिशत पद इंस्पेक्टर पद से पदोन्नति के माध्यम से भरे जाते हैं, जबकि वर्तमान नियम के तहत केवल 30 प्रतिशत पद ही प्रमोशन के जरिए भरे जाते हैं। इससे इंस्पेक्टर पद पर कार्यरत कई अधिकारी वर्षों तक पदोन्नति से वंचित रह जाते हैं।

प्रार्थी ने अदालत को बताया कि इस नीति के कारण कई इंस्पेक्टर 15 से 20 वर्षों से एक ही पद पर कार्य कर रहे हैं और उन्हें असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर पदोन्नति का अवसर नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने इसे न केवल अन्यायपूर्ण बल्कि असंवैधानिक भी बताया।

इस मामले में अगली सुनवाई में कोर्ट इस बात पर विचार करेगा कि क्या 2009 की यह नियमावली वर्तमान परिस्थितियों में उचित और न्यायसंगत है या नहीं। फिलहाल, भर्ती प्रक्रिया जारी रहने के साथ-साथ यह मामला कानूनी रूप से बेहद अहम बन गया है, जिसका असर बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों और सेवा में कार्यरत अधिकारियों पर पड़ सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

close