न घड़ी, न कैलेंडर… जंगल की सांसों पर चलता है वक्त! दुनिया से कटा भारत का रहस्यमयी समुदाय

🌓 जहां सूरज बताता है समय और जानवरों की चाल से बदलता है साल

दुनिया डिजिटल हो चुकी है। हर हाथ में मोबाइल, हर दीवार पर घड़ी और हर जेब में अलार्म। लेकिन सोचिए… अगर कोई ऐसी जगह हो जहां न समय की सुइयां चलती हों, न तारीखों का हिसाब रखा जाता हो, और फिर भी जिंदगी पूरी लय में बहती हो?

भारत में एक ऐसी ही रहस्यमयी जनजाति आज भी मौजूद है — चोलनाइक्कन जनजाति


🌳 केरल के घने जंगलों में छिपी एक अलग दुनिया

केरल के नीलांबुर जंगल की घनी हरियाली के बीच यह जनजाति रहती है। ये दुनिया से लगभग कटे हुए हैं।
न मोबाइल, न इंटरनेट, न मॉडर्न लाइफ का कोई असर।

यहां वक्त को घड़ी से नहीं, सूरज की रोशनी से महसूस किया जाता है
जैसे-जैसे दिन की रोशनी कम होती है, उनकी गतिविधियां भी धीमी पड़ जाती हैं।
कोई अलार्म नहीं बजता… जंगल की खामोशी ही संकेत देती है कि अब विश्राम का समय है।


🐾 जानवरों के व्यवहार से बदलता है साल

जहां हम कैलेंडर पलटकर मौसम बदलते देखते हैं, वहीं चोलनाइक्कन लोग जानवरों की चाल, पक्षियों की आवाज़ और पौधों की बढ़त से साल के बदलने का अंदाजा लगाते हैं।

अगर किसी खास प्रजाति का पक्षी लौट आए,
अगर जंगल में कुछ खास फूल खिल उठें,
अगर जानवरों की गतिविधियों में बदलाव दिखे —

तो समझ लीजिए, मौसम बदल चुका है।

वे किसी मशीन से समय नहीं पढ़ते,
बल्कि जंगल की धड़कन को सुनते हैं


🌿 जंगल ही घर, अस्पताल और स्कूल

चोलनाइक्कन लोगों के लिए जंगल सिर्फ रहने की जगह नहीं है —
वह उनका घर, अस्पताल, बाजार और गुरुकुल सब कुछ है।

दवा वाले पौधों की पहचान, खाने योग्य जड़ों का ज्ञान, और जिंदा रहने की कला —
ये सब किताबों में नहीं मिलते।
यह समझ पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के जरिए आगे बढ़ती आई है।

जिसे बाहरी दुनिया “साइंटिफिक नॉलेज” कहती है,
उसे ये लोग रोज जीते हैं।


🔥 खेती नहीं, शिकार और जंगल पर निर्भर जीवन

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह समुदाय पारंपरिक रूप से शिकारी और संग्रहकर्ता रहा है।
खेती उनकी जीवनशैली का हिस्सा कभी नहीं रही।

उनकी रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह जंगल की पैदावार पर टिकी है —
जंगल जितना देता है, उतना ही वे लेते हैं।


🌌 आधुनिक दुनिया से दूर… लेकिन क्या सच में पीछे?

जहां पूरी दुनिया समय के पीछे भाग रही है,
वहीं चोलनाइक्कन लोग समय के साथ चल रहे हैं।

न तनाव, न भागदौड़,
न अलार्म की कर्कश आवाज —
बस सूरज, चांद और जंगल की लय।

शायद सवाल ये नहीं है कि वे दुनिया से पीछे हैं…
बल्कि ये है कि क्या हम कहीं आगे निकलते-निकलते कुछ जरूरी चीजें पीछे तो नहीं छोड़ आए?

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