झारखंड: शिक्षिका के खाते में पड़े थे 25 लाख रुपये, फिर भी पैसे के अभाव में हो गयी मौत, मौत की ये कहानी रुला देगी, जानिये कौन है जिम्मेदार
Jharkhand: A teacher had Rs 25 lakh in her bank account, yet she died due to lack of money. This heartbreaking story of her death will bring you to tears. Find out who is responsible.

जमशेदपुर। खाते में 25 लाख रुपये पड़े थे, फिर भी पैसे के अभाव में एक शिक्षिका की मौत हो गयी। ये शर्मनाक घटना झारखंड के जमशेदपुर की है। जहां शिक्षिका अंजलि बोस की मौत ने बैंकिंग व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इलाज के लिए पर्याप्त राशि खाते में होने के बावजूद, नॉमिनी नहीं होने के कारण समय पर पैसा नहीं मिल सका और उपचार के अभाव में उनकी जान चली गई।
जानकारी के मुताबिक सोनारी की रहने वाली और झारखंड सरकार की सेवानिवृत्त शिक्षिका अंजलि बोस की मौत ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सरकारी नियम और बैंकिंग प्रक्रियाएं किसी व्यक्ति की जान से भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं।अंजलि बोस अविवाहित थीं और उन्होंने अपने पूरे सेवाकाल की मेहनत की कमाई लगभग 25 लाख रुपये भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की सोनारी शाखा में जमा कर रखी थी।
दुर्भाग्य से उन्होंने अपने खाते में किसी को नॉमिनी नहीं बनाया था। यही तकनीकी कमी उनके जीवन की सबसे बड़ी बाधा बन गई। जब उनकी तबीयत अचानक गंभीर रूप से बिगड़ी और डॉक्टरों ने बेहतर इलाज के लिए उन्हें बड़े अस्पताल में रेफर करने की सलाह दी, तब परिवार को उम्मीद थी कि बैंक में जमा उनकी राशि उनके इलाज में सहारा बनेगी।
लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट साबित हुई। अंजलि बोस की छोटी बहन गायत्री बोस अपनी बहन की जान बचाने के लिए लगातार बैंक अधिकारियों के चक्कर काटती रहीं। उन्होंने बार-बार यह स्पष्ट किया कि मरीज की हालत नाजुक है और तत्काल इलाज के लिए पैसों की जरूरत है।
इसके बावजूद बैंक अधिकारियों ने हर बार नियमों का हवाला देते हुए कहा कि खाते में नॉमिनी नहीं होने के कारण पैसा निकाला जाना संभव नहीं है और इसमें कानूनी अड़चनें हैं।
परिजन लगातार गुहार लगाते रहे, जबकि अस्पताल के बिस्तर पर एक शिक्षिका जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करती रही। इलाज के अभाव और देरी के कारण स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई।
इसी बीच मामले की गंभीरता को देखते हुए भाजपा के पूर्व नेता विकास सिंह ने हस्तक्षेप किया और सीधे उपायुक्त (डीसी) को इस घटना की जानकारी दी। प्रशासन के दबाव के बाद बैंक अधिकारी हरकत में आए और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने की कोशिश शुरू की गई।
लेकिन यह सक्रियता बहुत देर से आई। शुक्रवार सुबह करीब 8 बजे अंजलि बोस ने अंतिम सांस ली। इसके ठीक दो घंटे बाद, सुबह लगभग 10 बजे बैंक के अधिकारी नकदी लेकर एमजीएम अस्पताल पहुंचे। जिस मदद के लिए परिजन कई दिनों से गुहार लगा रहे थे, वह अंजलि बोस की मौत के बाद पहुंची।
अस्पताल परिसर में यह दृश्य देखकर परिजनों का आक्रोश फूट पड़ा। अधिकारियों ने माफी जरूर मांगी, लेकिन यह सवाल वहीं खड़ा रह गया कि क्या एक माफी उस जान की भरपाई कर सकती है, जिसे समय पर सहायता देकर बचाया जा सकता था।
परिजनों का कहना है कि यदि बैंक और प्रशासन ने 24 घंटे पहले भी मानवीय आधार पर लचीलापन दिखाया होता, तो अंजलि बोस आज जीवित होतीं। यह घटना हमारे बैंकिंग सिस्टम की उस ‘रॉबोटिक’ कार्यशैली को उजागर करती है, जहां आपात परिस्थितियों में भी मानवीय पहल की जगह केवल फाइलों और नियमों का पालन किया जाता है।इस मामले ने न केवल बैंकिंग व्यवस्था, बल्कि नीति निर्माताओं के सामने भी एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।


















