CGST की कुर्सी से उठा डेढ़ करोड़ का फरमान…एक रुपया भी कम नहीं…मैडम की जिद ने खोल दी पूरी साजिश…

CBI की FIR में सनसनीखेज खुलासा—छापेमारी से लेकर घूस की वसूली तक, अफसर–बिचौलिया–कारोबारी का पूरा नेटवर्क बेनकाब

लखनऊ/झांसी। केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (CGST) झांसी से जुड़ा डेढ़ करोड़ रुपये की रिश्वतखोरी का मामला अब सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के रूप में सामने आया है। सीबीआई की एफआईआर में हुए खुलासों ने सिस्टम के भीतर चल रहे उस खेल की परतें खोल दी हैं, जिसमें कानून को डर और दबाव का हथियार बनाकर कारोबारियों से मोटी रकम वसूली गई।

“डेढ़ करोड़ से एक रुपया भी कम नहीं”

एफआईआर के मुताबिक, CGST की डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी ने मध्यस्थों को साफ संदेश दिया था कि रिश्वत की रकम डेढ़ करोड़ रुपये से एक रुपया भी कम नहीं होगी। अधिकारियों की यह सख्ती कानूनी कार्रवाई के नाम पर डर पैदा करने की रणनीति का हिस्सा थी।

छापेमारी बनी वसूली का जरिया

18 दिसंबर 2025 को CGST टीम ने झांसी के दो बड़े कारोबारियों—जय अंबे प्लाईवुड और जय दुर्गा हार्डवेयर—के गोदामों पर छापा मारा। छापेमारी के दौरान अघोषित स्टॉक और टैक्स उल्लंघन से जुड़े दस्तावेज बरामद हुए।
यहीं से शुरू हुआ खेल—कानूनी कार्रवाई को सौदेबाजी में बदलने का।

बिचौलिया एक्टिव, डर का खेल शुरू

छापेमारी के तुरंत बाद अधिवक्ता नरेश कुमार गुप्ता ने बिचौलिए की भूमिका निभाते हुए कारोबारियों से संपर्क किया। उसने भरोसा दिलाया कि वह अधिकारियों से बात कर मामला “सेटल” करा सकता है।
अधिकारियों को बताया गया कि कारोबारी किसी भी कीमत पर केस खत्म कराना चाहते हैं। इसके बाद अघोषित स्टॉक और टैक्स चोरी के सबूतों का डर दिखाकर रिश्वत की मांग तेज कर दी गई।

‘मैडम’ मौके पर, कोई रियायत नहीं

CGST सुपरिटेंडेंट अनिल तिवारी ने साफ कहा कि “मैडम” यानी डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी खुद छापेमारी स्थल पर मौजूद हैं और किसी भी तरह की नरमी के मूड में नहीं हैं।
संदेश साफ था—या तो भारी रकम दो, या फिर कानूनी कार्रवाई झेलो।

मुलाकातें, सौदे और रकम की प्लानिंग

  • 19 दिसंबर: कारोबारी लोकेंद्र तोलानी और राजू मंगतानी ने अनिल तिवारी के घर जाकर बातचीत की

  • 22 दिसंबर: नरेश गुप्ता और तेजपाल मंगतानी की अजय शर्मा से मुलाकात

  • 23 दिसंबर: राजू मंगतानी को 30 लाख रुपये देने का निर्देश

  • 25 दिसंबर: 70 लाख रुपये की व्यवस्था के लिए जगदीश बजाज से मदद मांगी गई

एफआईआर के मुताबिक कुल मांग 1.5 करोड़ रुपये थी, जिसमें से 30 लाख रुपये पहले ही दिए जा चुके थे

रकम कम करने से साफ इनकार

सीबीआई की एफआईआर में दर्ज है कि डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी ने रिश्वत की रकम घटाने से साफ इनकार कर दिया और पूरे डेढ़ करोड़ पर अड़ी रहीं
यही जिद आखिरकार इस पूरे नेटवर्क को बेनकाब करने की वजह बन गई।

सवाल जो सिस्टम से टकराते हैं

यह मामला सिर्फ एक रिश्वतखोरी नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर बड़ा सवाल है जहां कानून की आड़ में सौदे तय होते हैं। अब निगाहें सीबीआई की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं—क्या इस डेढ़ करोड़ की कहानी में और बड़े नाम सामने आएंगे?

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