नींव खोदते मजदूरों के हाथ लगा 36 किलो का रहस्यमयी घड़ा …जब खोला तो सबके उड़ गए होश…जमीन के नीचे दबा था सदियों पुराना खजाना….
नींव की मिट्टी में छिपा था इतिहास: मजदूरों ने पाया 36 किलो वजनी घड़ा, निकले कुषाणकालीन तांबे के सिक्के

नींव खोदते मजदूरों के हाथ लगा 36 किलो का रहस्यमयी घड़ा …जब खोला तो सबके उड़ गए होश…जमीन के नीचे दबा था सदियों पुराना खजाना….
महराजगंज। उत्तर प्रदेश के महराजगंज ज़िले के लक्ष्मीपुर क्षेत्र के ग्राम पंचायत बनरसिहा कला से एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां देवदह बौद्ध स्तूप की चहारदीवारी निर्माण के लिए जब मजदूर नींव खोद रहे थे, तो अचानक उनके फावड़े से किसी कठोर चीज़ की टकराहट हुई। जब मिट्टी हटाई गई तो सभी दंग रह गए — वहां से निकला मिट्टी का एक भारी घड़ा, जिसका वजन करीब 36 किलोग्राम था।
मजदूरों ने जब घड़ा खोला, तो उनके होश उड़ गए। अंदर से कुषाणकाल (30 ईस्वी से 375 ईस्वी) के तांबे के सैकड़ों सिक्के मिले। सूचना तुरंत पुरातत्व विभाग को दी गई।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी कृष्ण मोहन द्विवेदी रविवार शाम मौके पर पहुंचे और घड़े सहित सभी सिक्कों को अपने कब्जे में लेकर राज्य पुरातत्व विभाग, लखनऊ भेज दिया।
बनरसिहा कला की 88.8 एकड़ भूमि पहले से ही संरक्षित क्षेत्र घोषित है। यहां पिछले वर्षों में दो चरणों में खुदाई की जा चुकी है, जिसमें मिट्टी के बर्तन, खिलौने, रिंगबेल और दीवारों के अवशेष मिले थे।
पुरातत्वविदों का मानना है कि यह स्थल संभवतः कुषाणकालीन नगर था, जो बौद्ध इतिहास से गहराई से जुड़ा हो सकता है। कुछ विशेषज्ञ इसे भगवान बुद्ध की ननिहाल “देवदह” से जोड़कर भी देख रहे हैं, हालांकि अब तक इस दावे का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है।
अधिकारी द्विवेदी ने बताया —
“घड़े में मिले सभी सिक्के कुषाणकाल के हैं और तांबे के बने हैं। इससे पहले भी इस क्षेत्र से ऐसे सिक्के मिल चुके हैं। यहां सिक्कों का मिलना बिल्कुल स्वाभाविक है, क्योंकि यह क्षेत्र ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है।”
फिलहाल, इस खोज ने पूरे इलाके में हलचल मचा दी है। गांववाले अब तक यकीन नहीं कर पा रहे कि उनके पैरों तले सदियों पुराना खजाना दबा हुआ था।









