10 महीने की नन्हीं परी बनी अमर… जाते-जाते 4 बच्चों को दे गई जिंदगी…राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई…

ब्रेनडेड घोषित होने के बाद माता-पिता का साहसी फैसला; केरल की सबसे कम उम्र की अंगदाता बनीं आलिन शेरिन अब्राहम

केरल। मौत के बाद भी कोई कैसे अमर हो सकता है, इसकी मिसाल पेश की है 10 महीने की मासूम आलिन शेरिन अब्राहम ने। इतनी छोटी उम्र में ही वह केरल की सबसे कम उम्र की अंगदाता बन गईं। उनके जाने का दर्द असहनीय था, लेकिन उनके माता-पिता के साहसिक निर्णय ने चार अन्य परिवारों के बुझते चिराग फिर से जला दिए।

मंगलवार को नेदुंगदप्पल्ली के सेंट थॉमस सीएसआई चर्च में जब इस नन्हीं जान को अंतिम विदाई दी गई, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। केरल सरकार ने इस अद्भुत बलिदान को सम्मान देते हुए उन्हें पूरे राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी।

 एक हादसा… जिसने सब बदल दिया

5 फरवरी को एक सड़क दुर्घटना में आलिन गंभीर रूप से घायल हो गई थीं। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और ब्रेनडेड घोषित कर दिया गया। अपनी इकलौती बेटी को खोने के असहनीय दुख के बीच पिता अरुण अब्राहम और मां शेरिन ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने इंसानियत की मिसाल कायम कर दी।

आलिन का लीवर, दोनों किडनी, कॉर्निया और हार्ट वॉल्व दान किए गए। इन अंगों की मदद से अब चार अन्य बच्चे सामान्य जीवन की उम्मीद के साथ आगे बढ़ सकेंगे।

 चमेली के फूलों में सजी अंतिम यात्रा

जब सुबह आलिन का पार्थिव शरीर चमेली के फूलों से सजे छोटे से सफेद ताबूत में घर लाया गया, तो जनसैलाब उमड़ पड़ा। केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी, राज्य मंत्री वीना जॉर्ज और वीएन वासवन सहित कई गणमान्य लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।

पूरा माहौल गमगीन था, लेकिन उस गम के बीच गर्व की एक चमक भी दिखाई दे रही थी।

 दादा का संदेश… जिसने सबको रुला दिया

अंतिम प्रार्थना के दौरान आलिन के दादा रेजी सैमुअल ने भावुक संदेश पढ़ा। उन्होंने कहा—
“हमारी बच्ची ने 20 महीने का सफर तय किया, 10 महीने गर्भ में और 10 महीने इस धरती पर। हां, दर्द तो बहुत है, लेकिन हमें सांत्वना है कि हमारी पोती अब चार बच्चों के रूप में जीवित है। ईश्वर ने उसे जिस मकसद के लिए भेजा था, वह उसे पूरा कर वापस लौट गई है।”

उनके शब्दों ने चर्च में मौजूद हर शख्स को भावुक कर दिया।

 जब दो परिवारों का दर्द और कृतज्ञता मिले

एक बेहद मार्मिक पल तब आया, जब उस बच्ची श्रेया के दादा चंद्रन वहां पहुंचे, जिसे आलिन की किडनी मिली है। उन्होंने ताबूत के पास खड़े होकर कहा—
“मैं उस नन्हीं परी का शुक्रिया अदा करने आया हूं, जिसने मेरी पोती को नया जीवन दिया। मैं एक दादा हूं और समझ सकता हूं कि इस परिवार पर क्या बीत रही है।”

 मानवता की मिसाल

आलिन की कहानी सिर्फ एक दुखद हादसे की खबर नहीं है, बल्कि यह अंगदान के महत्व और जागरूकता का एक बड़ा संदेश है। एक छोटा सा जीवन, जो बहुत संक्षिप्त था, लेकिन उसने जो रोशनी फैलाई है, वह अनगिनत जिंदगियों को प्रेरित करती रहेगी।

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